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अब जून - जुलाई नहीं, सितम्बर में हो रही अधिक बारिश

0 comments, 2022-09-27, 287853 views

वैज्ञानिकों के अनुसार 1950 के दशक के बाद से दक्षिण एशिया में मानसून के पैटर्न में बदलाव आए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब मॉनसून के मौसम में एक लंबे शुष्क समय के बाद अचानक भारी बारिश का दौर आता है। गौर करने वाली बात यह है कि तापमान में एक डिग्री की वृद्धि से बारिश की मात्रा सात प्रतिशत तक बढ़ती है। मॉनसून के दिनों में यह 10 प्रतिशत तक जाती है। यही वजह है कि दक्षिण एशिया में अत्यधिक बारिश की घटनाओं के बढ़ने का अनुमान है।

इसलिए अधिक हो रही सितंबर में बारिश सितंबर में अधिक बारिश का पहला कारण पैसिफिक ओसन के ऊपर बना अल नीनो का इफेक्ट है, जिसने मानसून को दबाया और जुलाई में कम बारिश हुई। दूसरा, वर्तमान में समुद्री सतह का तापमान और भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की हवाएं अल नीनो का संकेत दे रही हैं। हालांकि मानसून के आखिरी चरण अथवा उसके बाद ला नीना की स्थिति फिर से उभरने की संभावना है। तीसरा कारण बंगाल की खाड़ी में बना कम दबाब का क्षेत्र है। इसके लगातार बनने से लंबे वक्त तक भारी बारिश होती है।

बदल रहा है बारिश का पैटर्न केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान सचिव एम. रविचंद्रन ने कहा, अल नीनो और ला नीना मानसूनी बारिश को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं। सितंबर में मौसम मुख्य रूप से ध्रुवीय क्षेत्र से प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि न केवल स्थानिक, बल्कि अंतर-मौसमी कारक भी बारिश का पैटर्न बदल रहे हैं।

अध्ययन में क्या आया सामने हिमालय की तलहटी में अधिक बारिश होने की जांच करने के लिए किए गए अध्ययन में 17 वर्षों (2001-2017) की बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसके साथ ही एरोसोल माप का भी आकलन किया गया। वहीं, थर्मोडायनामिक वेरिएबल्‍स और लांग वेब रेडिएशन की गणना से भारी वर्षा का गणित समझने में मदद मिली। टीम को भारी बारिश की घटनाओं, उच्च एरोसोल लोडिंग और स्थैतिक ऊर्जा (एमएसई) बीच स्पष्ट जुड़ाव मिला। इससे यह स्पष्ट हुआ कि हिमालय क्षेत्र में उच्च वर्षा की घटनाओं पर एरोसोल के विकिरण प्रभाव का महत्वपूर्ण असर होता है।

क्या हैं एरोसोल सूक्ष्म ठोस कणों अथवा तरल बूंदों के हवा या किसी अन्य गैस में समाहित होने को एरोसोल कहा जाता है। एरोसोल प्राकृतिक या मानव जनित हो सकते हैं। हवा में उपस्थित एरोसोल को वायुमंडलीय एरोसोल कहा जाता है। धुंध, धूल, वायुमंडलीय प्रदूषक कण तथा धुआं एरोसोल के उदाहरण हैं। तरल या ठोस कणों का व्यास 1 माइक्रोन या उससे भी छोटा होता है। बीते कुछ सालों में शोधकर्ताओं ने इस बात पर भी जोर देना शुरू किया है कि वाहनों के धुएं, अधजले फसल अवशेषों तथा धूल और रासायनिक अपशिष्ट से निकलने वाला एरोसोल जीवनदायी बरसात के मौसम को और अधिक कमज़ोर कर रहा है।

ये हैं अल-नीनो और ला-नीना अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्य क्षेत्र की उस मौसमी घटना को कहते हैं, जिसमें पानी की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है और हवा पूर्व की ओर बहने लगती है। यह न केवल समुद्र पर बल्कि वायुमंडल पर भी प्रभाव डालता है। इस घटना के चलते समुद्र का तापमान 4 से 5 डिग्री तक गर्म हो जाता है। ला नीना में पश्चिमी प्रशांत महासागर क्षेत्र में सामान्य से कम वायुदाब की स्थिति बनती है। इसके कारण समुद्र का तापमान सामान्य से घट जाता है। आमतौर पर इन दोनों घटनाओं का असर 9 से 12 महीने तक रहता है, पर कभी-कभी यह स्थिति कई वर्षों तक बनी रह सकती है। दोनों घटनाएं दुनिया भर में बारिश, तूफान, बाढ़, सूखा जैसी घटनाओं को प्रभावित करती हैं। इनकी वजह से कहीं सामान्य से ज्यादा बारिश होती है तो कहीं सूखा पड़ता है, और कहीं तूफान आते हैं।


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Awantika Awasthi
यूपी पत्रिका डेस्क
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