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भगवान श्रीराम के प्रवास स्थल रहे सकरौराघाट प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अपनी दुर्दशा पर बहा रहा है आंसू

0 comments, 2018-11-15, 98982 views

  जी.के.श्रीवास्तव
भगवान श्रीराम के प्रवास स्थल रहे सकरौराघाट से सरयू नदी की धारा मुड़ जाने के कारण वीरान होकर बदतर स्थिति में पहुंचता जा रहा है।क्षेत्रीय लोगों की श्रद्धा का केन्द्र बिन्दु रहा सकरौराघाट प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है।
नगर से मात्र दो किमी दूर स्थित सकरौरा घाट की जानकारी वयोवृद्ध के अनुसार बाबा आत्माराम नामक एक सिद्धपुरूष नेसन 1900 के लगभग सकरौराघाट का निर्माण कराया था।इस कार्य में बाबा मलूकदास ने भी काफी सहयोग प्रदान किया था।सकरौरा शाहपुर राज्य के अन्तर्गत होने से शाहपुर के डा0नगेश्वर सिंह ने भी इसमें पूर्ण सहयोग दिया था।सकरौराघाट से लगभग डेढ किमी दूर दक्षिणपूर्व  दिशा में सुदियाग्राम के पास सरयू नदी से तीन ओर घिरी भूमि अगस्त्य कुण्ड के नाम से प्रसिद्ध है।यह नैमिषारणय की चैरासी कोसी परिक्रमाके अंतर्गत है।पुराणों के अनुसार 12 वर्षीय धर्म सम्मेलन के सम्बन्ध मे पधारे अगस्त्य मुनि ने यहा कुछ दिन ठहरकर तपस्या कर धर्मोपदेश दिया थाइस स्थान पर पुराना मन्दिर कालकवलित हो चुका है,उसके स्थान पर बादामी पत्थर पर शंकर शिलादिखाई पडती है।तपस्या स्थल पर तहखानानुमा स्थान है जो पटता जा रहा है। यहां पर घाट व सीढियां बनी हैं,पास मे ही पुराना वट वृक्ष है।वट वृक्ष के सामने पहले एक पुराना कुण्ड था।जिसमें सदैव पानी भरा रहता था,जो अब पट चुका है ।जनश्रुतियों के अनुसार अगहन मास की पूर्णमासी की रात 12 बजे इस कुण्ड में जल के अन्दर से एक स्वर्ण नौका निकलती थी जिसमें अगस्त्य मुनि समेत कुछ अन्य ऋषि भी रहते थे ।जल की बसती से वहां दर्शकों की भीड  रहती थी।दन्त कथाओं के अनुसार एक बार भगवान राम अपने चारों भाइयों समेत अगस्त्य मुनि के दर्शन हेतु आश्रम में पधारे थे।उस समय भाइयों समेत भगवान राम ने सरयूनदी के तट रात्रि विश्राम किया था उस स्थान को उसे ही सकरौरा घाट के नाम से जाना जाता है।बाबा आत्माराम ने उसी विश्राम स्थल की स्मृति में सकरौरा घाट का निर्माण कराया था।बादमें अंग्रेजी शासन के दौरान शहर की बस्ती से घाट तक सडक का निर्माण कराया था।सडक की मरम्मत न होने से हालत बिगड गयी और नगर परिषद द्वारा 1929 में खडन्जे का निर्माण कराया गया।सकरौरा घाट किसी जमाने में एक सुरम्य स्थल था,जहां घाट पर 25 से 30 सीढियां व चार धर्मशालाए,व परसात मन्दिर बने हुए थे।स्नान के लिए पुरूष व महिलाओं के लिए अलग अलग घाट आज भी टिन शेड बने हुए हैं।महिलाओं के तरफ बने टिन शेड तो गायब हो चुके हैं लेकिन पुरूषों की ओर अभी लगे हैं।सकरौरा घाट पर प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के दिन विशाल मेला लगता था जिसमें आसपास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में स्नानार्थी आकर रात में रूककर प्रातः स्नान कर मेला देखकर दूसरे दिन जाते थे।मेला का प्रभाव सत्तर के दशक में सरयू नदी की धारा में मोड़ आ जाने के कारण शुरू हुआ जिसमें पहले तो मेले का असर कम हुआ और बाद में घाट मात्र तालाब बनकर ही रह गया।उदासीनता के चलते चार में से दो धर्मशालाएं व दो मन्दिर भी गिर चुकी अन्य खण्डहर में बदल गयीं।घाट की सुन्दरता को आसामाजिक तत्वों ने जुआडियों का अडडा बना दिया है।उल्लेखनीय हो कि 1964 में सरयू नदी की धारा कटराघाट में पुल बनने के बाद नदी की ठोकर उत्तर दिशा में बना देने के कारण नदी का बहाव दक्षिण दिशा की ओर होता चला गया।सन 1930 तक तो घाट की व्यवस्था का रखरखाव मन्दिरों के खेतों से प्राप्त आमदनी से चलता थ इसके बाद नगर के धार्मिक व्यक्ति बद्रीप्रसाद साह द्वारा वहन किया जाने लगा।सन 1952 से 55 तक घाट की जिम्मेदारी ग्राम समाज ने अपने ऊपर ले ली और इसके बाद नोटीफाइड एरिया ने प्रबन्ध अपने कब्जे में ले लिया,और मछली बालू के ठेके से प्राप्त आय से देखरेख करती रही।स्थिति बदतर होने पर घाट के देख भाल को लेकर गल्लामण्डी से पौव्वा कटता था जिसे धर्मसभा कमेटी के माध्यम से देखभाल होता रहा।
सरयू नदी की धारा मोडने को लेकर नगर में हिन्दू धर्म सेवादल का गठन कर प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति सहित सभी केन्द्र व राज्य के अधिकारियों को पत्र भेजकर जीर्णोद्धार की मांग की लेकिन अथक प्रयास पर पर्यटन विभाग की ओर से 16 लाख रूपये का बजट मिला जिसमें कुछ कार्य हुआ।इसओर भगीरथी प्रयास करने वाले राज्य मंत्री योगेश प्रताप सिंह ने तीस लाख रूपये से ड्रेन योजना के अन्तर्गत 3.87किमी नहर खुदवाने के लिए स्वीकृति दिलायी । जिससे 600हेक्टेयर भूमि लाभानिवत होने का अनुमान लगाया गया ।इंस्टीमेट के अनुसार साढे तीन मीटर गहरी नहर को ठेकेदार की मिली भगतसे मात्र दो मीटर नाले के रूप में खोदकर धन को हजम कर लिया।नदी की धारा केवल नाले के रूप में आई और तालाब को स्विीमिंग पुल के अनुसार बनाया गया जो देखरेख व पानी न आने के अभाव में चोरों का शिकार बनकर जलकुम्भी में तब्दील होकर रह गयी है।गतवर्ष गायत्री परिवार व इस वर्ष सरयू उिग्री कालेज के छात्रों  की ओर से कटराघाट पर साफ सफाई अभियान लगाकर नदी से जलकुम्भी आदि का कार्य किया गया किन्तु पौराणिक सकरौराघाट पर धारा के अभाव में कोई कार्य नही कराया गया।
 इनसेट
कर्नलगंज तहसील क्षेत्र में कार्तिक पूर्णिमा मेले के मद्देनजर करनैलगंज के सकरौरा एवं सरयू घाट पर साफ-सफाई प्रकाश एवं पेयजल व्यवस्था कराने की मांग को लेकर नमामि गंगे योजना के जिला संयोजक मुकेश कुमार वैश्य ने मुख्य विकास अधिकारी को एक प्रार्थना पत्र दिया है। जिसमें कहा गया है कि करनैलगंज के सकरौरा ग्रामीण में पौराणिक स्थल सकरौरा घाट पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन बड़ा मेला लगता है। जिसमें हजारों की संख्या में मेलार्थी प्रतिभाग करते हैं। घाट की सफाई, सगरा तालाब में पानी भराने, बिजली के खंभों में बल्ब लगवाने के साथ पेयजल की व्यवस्था कराए जाने की मांग की गई है। इसके साथ ही सरयू घाट पर कार्तिक पूर्णिमा को करीब दो लाख की संख्या में श्रद्धालु स्नान करते हैं वहां पेयजल, साफ-सफाई एवं प्रकाश की व्यवस्था कराए जाने की भी मांग की गई है।


UPPatrika
G K Srivastav
संवाददाता
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